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चाय और तुम

15 Mar

शाम के धुँधलके में
अचानक तुम्हारा मैसेज आया
“चाय पीने चलोगे?”
और मैंने सोचा
तुम्हारे लिए तो बस शाम की चाय हैं
हमारे लिए दिन शुरू करने कि वजह

काम की देरी की परवाह भी न थी
क़दम खुद-ब-खुद तुम्हारी तरफ बढ़ चले
अपनी तरफ़ यूँ ही देखा
और मैंने सोचा
तुम्हारे लिए तो ये बस चंद लम्हें हैं
हमारे लिए दुनिया को छोड़ देने कि तत्परता

घर के पास की ही उस टपरी पर
उस दिन बैठने कि जगह भी न थी
तुमने अनजाने में ही एक चिढ़ा हुआ चेहरा बनाया
और मैंने सोचा
तुम्हारे लिए वो जगह आज चिड़चिड़ी है
हमारे लिए गरमी में जैसे मनोहर छाँव

पैसे देने के वक़्त भोलेपन से तुमने मेरी तरफ देखा
और कहाँ – “मैं आज पैसे लाना भूल गयी!”
मैं, हमेशा की तरह मुस्कुराया
और मैंने सोचा
तुम्हारे लिए वो चाय भले दस रुपये कि है
हमारे लिए अनमोल

और एक यह आज है
तुम साथ नहीं हो
और मेरे हाथों में ये चाय की प्याली है
सच कहूं, बहुत सी चाय की प्यालियाँ पी है तुम्हारे बिना
और यकीन मानो मेरा
तुम कितनी भी बेख़बर हो
जानी-पहचानी चाय भी तुम्हारे साथ
एक अनजानी सी सुकून देती है
न ही वो चाय आम हैं
न ही वो लम्हे आम हैं

मैं कविता लिखता नहीं, न ही मुझे कविता लिखनी आती है. आज बस यूंही कुछ लिखने का दिल चाहा 🙂

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2 Comments

Posted by on March 15, 2014 in Personal, Random Thoughts

 

Tags: , , ,

2 responses to “चाय और तुम

  1. abhishek

    March 16, 2014 at 4:31 am

    NIce to see this side of yours. bahut accha laga padhke 🙂

     
  2. SachinManan

    March 18, 2014 at 5:38 pm

    your flow of words is amazing… seems it comes naturally to you… great blog.

     

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